आत्मा के रंग (होली पर विशेष)

* Holi special Hindi article by BK Anil Kumar. आत्मा के रंग (होली पर विशेष)

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होली का उत्सव भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। होली का आध्यात्मिक मतलब यही है की – आत्मा holy (पवित्र) बनती है। कैसे? – परमपिता परमात्मा के साथ मिलान (योग) होने से।  फिर यह भी मतलब है की ”जो बात हो-ली उसे भूलो और जीवन में आगे बड़ो – बीत गयी सो बात गयी”

होली के दिन हम अपनी पुराणी चीजों को, कीचड़ से बानी चीजों को अग्नि में डालते है – इसका अर्थ है – ”अपने पुराने स्वाभाव संस्कार को योग की अग्नि में भस्म (ख़तम) कर देना, अर्थात पवित्र बनना”

अर्थात पहले अपनी आत्मा को योग से पवित्र बनाना और फिर परमात्मा से मिलान मानना। 

Refer: आत्मा की ८ शक्तिया

You can also access this article in English. Visit 84 colours of Soul Consciousness

सभी प्रिय दैवी भाइयों और बहनों को होली पर्व की हार्दिक बधाई

आज सारा विश्व दुःख की होली खेल रहा है क्योंकि सभी एक दूसरे पर पांच विकारों व उनके वंशों के रंगों की बौछार कर रहे हैं । कोई काम का रंग, कोई क्रोध का रंग, कोई लोभ का तो कोई मोह के रंग से रंग रहा है, स्वार्थ, इर्ष्या, द्वेष, घृणा, अमानवता, आकर्षण और आवश्यकता के सूक्ष्म रंग से तो अधिकतर कोई बचा ही नहीं है । इन सबके मूल में है देह अभिमान का रंग जिसके कारण आज आत्मा बदरंग हो गयी है ।

उसका ओरिजिनल ( वास्तविक ) गुण रूपी रंग जो ज्ञान, शान्ति, प्रेम, सुख, पवित्रता, शक्ति, आनंद का है वह छिप गया है और ऊपर यह विकारों का कीचड़ आ गया है । तो आओ इस नयी दुनिया के आगमन के पहले सभी को आत्मिक रंगों से रंगकर सारे विश्व को आत्ममय बनायें । यह आत्मिक रंग एक परमात्मा के सत्संग द्वारा प्राप्त होती है । शिव परमात्म पिता नयी दुनिया के स्थापनार्थ कल्प कल्प संगमयुग में अवतरित होकर अपने आत्मा रूपी बच्चों को अपने संग के रंग से रंगकर आप समान पवित्र बना देते हैं । यही है सच्ची होली मनाना । लेकिन होली बनने वा होली मनाने के लिए पहलेअपवित्रता, बुराई को भस्म करना होगा । भिन्न भिन्न भाव भूलकर एक ही परिवार के हैं, एक ही समान याने भाई भाई की वृत्ति रखनी होगी तभी ही अविनाशी रंग का अनुभव कर सकेंगे । जब तक अपवित्रता, बुराई को भस्म नहीं किया है तब तक पवित्रता का रंग चढ़ नहीं सकता है ।

* ८४ आत्मिक स्मृति के रंग * (video)

* Above video link: 

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